शेयर इन्वेस्ट करने के लिए बेसिक जानकारी-Basic Knowledge for Invest in Shares

विश्व भर में लोग अपनी जमा पूंजी का छोटा या बड़ा हिस्सा शेयरों मे इन्वेस्ट (Invest in Shares) करते हैं।

ऐसा करने के कई लाभ है :

  • आप की जमा पूंजी काफी अच्छी रफ्तार से बढ़ती है। शेयरों (Shares) में लंबे समय के लिए किए गए इन्वेस्ट (Invest) पर बैंकों में फिक्स डिपाजिट (FD) आदि विभिन्न विकल्पों की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ पा सकते हैं।
  • शेयरों (Shares) से आपको डिविडेंड (Divedend) के रूप में नियमित इनकम (Income) भी मिलती है।
  • जमीन जायदाद की अपेक्षा शेयरों (Shares) को बहुत सरलता से कभी भी बेंच कर नकद पैसा पा सकते हैं।
  • शेयरों (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करना और अपनी इन्वेस्टमेंट (Investment) को संभालना बहुत आसान है।

शेयरों में इन्वेस्ट (Invest in shares) करने के लिए आपको लंबी चौड़ी पूंजी नहीं चाहिए। आप कम पैसों से भी शुरुआत कर सकते हैं।

शेयर बाजार (Share Market) में लाभ कमाने के लिए आपको बिजनेस एक्सपर्ट (Business Expert) चार्टर्ड अकाउंटेंट (Chartered Accountant) या मैथ्स में मास्टर (Master in Maths) होने की कतई आवश्यकता नहीं है।

जिन लोगों ने शेयरों के जरिए अपनी किस्मत चमकाई है, वह सब अन्य क्षेत्रों से संबंध रखने वाले आम इन्वेस्टर ही थे। अगर वे लोग शेयरों से इतना लाभ कमा सकते हैं तो आप क्यों नहीं ?

आवश्यकता है तो केवल सामान्य ज्ञान और कंपनियों के बारे में जानकारी एकत्रित करने और उनके विश्लेषण में कुछ समय लगाने की। इस थोड़ी भर मेहनत से आप जीवन भर शेयरों में इन्वेस्ट (Invest in Shares) कर धन कमा सकते हैं।

आइए, आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से यह जानेंगे कि शेयर (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करने के लिए हर इन्वेस्टर (Investor) को कौन कौन सी बेसिक जानकारी होनी चाहिए? (What is Basic Knowledge require before invest in Shares) और इनका क्या महत्व है? (What is the Important of this Knowledge)

Page Contents

शेयर क्या होते हैं ? – What is shares ?

दैनिक बोलचाल की भाषा में जब शेयरों (Shares) की बात करते हैं तो इसका मतलब किसी कंपनी के इक्विटी शेयर (Equity shares) से होता है। शेयर और स्टॉक आमतौर पर एक ही अर्थ रखते हैं।

इक्विटी शेयर किसी कंपनी में स्वामित्व का प्रमाण होता है। कंपनियां एक तय मूल्य पर शेयर जारी करती है, जो उस शेयर की फेस वैल्यू (Face value) या पार वैल्यू (Par Value) होती है।

जब आप शेयरों (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करते हैं तो आप कंपनी के स्वामित्व में हिस्सा खरीदते हैं।

इन्वेस्टमेंट क्या होता है ? – What is Investment ?

आप अपनी जमा पूंजी का जो उपयोग करते हैं उसे इन्वेस्टमेंट (Investment) कहते हैं।

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अपनी जमा राशि का वैल्यू बनाए रखने के लिए आपको उसे नकद के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में रखना होता है जिसे इन्वेस्टमेंट (Investment) कहते हैं, जैसे की :- जमीन, मकान, कमर्शियल प्रॉपर्टी ,सोना ,आभूषण, पेंटिंग्स, बैंकों या कंपनियों में डिपाजिट करना, शेयर, बॉन्ड और ऐसी कोई वस्तु खरीद सकते हैं।

कंपनी क्या होती है?-What is the Company?

कंपनी (Company) एक प्रकार का बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन (Business Organization) होता है जिसे कुछ शेयरहोल्डर्स (Share holders) मिलकर बिजनेस करने के लिए का गठित करते हैं। कंपनी का बिजनेस (Business) चलाने के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (Board of Directors) को अप्वॉइंट किया जाता है।

आमतौर, पर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर शेयरहोल्डर्स के चुने हुए रिप्रेजेंटेटिव (Representative) होते हैं।

बिजनेस शुरू करने के लिए और उसे चालू रखने के लिए जो धन या पैसा लगाया जाता है, उसे कैपिटल (Capital) कहते हैं।

शुरुआती कैपिटल शेयरहोल्डर्स (Share Holders) से कंपनी में जॉइंट ऑनर (Joint Owner) होने के कारण लिया जाता है। शेयरहोल्डर से मिले इस धन को इक्विटी कैपिटल (Equity Capital) कहते हैं।

कंपनियां बैंकों (Bank),फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) और जनता से पैसा उधार लेकर भी कैपिटल का प्रबंध करती है। 

जनता से पैसा या तो फिक्स डिपाजिट (Fixed Deposit) के जरिए लिए जाता है या फिर डिबेंचर (Debenture), बॉन्ड (Bonds) कि बिक्री के जरिए लिया जाता है।

डिबेंचर खरीदने वाले इन्वेस्टर (Investor) को डिबेंचर होल्डर (Debenture Holder) कहा जाता है। कंपनी इनका पैसा चुकाने के लिए बाध्य होती है।

शेयरहोल्डर्स के अधिकार और उत्तरदायित्व-Shareholder’s Rights and Responsibility

कंपनी की अपनी अलग लीगल आईडेंटिटी (Legal Identity) होती है। इसका मतलब यह हुआ कि कंपनी बिजनेस समझौते (Business Agreement) कर सकती है, प्रॉपर्टी (Property) खरीद और बेच सकती है, लीगल एक्शन (Legal Action) ले सकती है और लोन (Loan) एवं एडवांसेज (Advance) भी उठा सकती है।

शेयरहोल्डर्स को कंपनी डायरेक्टरों ( Directors) या कंपनी में काम करने वाले लोगों के किसी भी काम के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। शेयरहोल्डर्स की जिम्मेदारी उस कंपनी मे उसके शेयरो के मूल्य तक ही सीमित होती है।

कंपनी के दिवालिया (Bankrupt) घोषित होने की स्थिति में शेयरहोल्डर्स को कंपनी या उसके कर्जदारो (Borrowers) को कोई पैसा देने के लिए नहीं कहा जा सकता। इस नियम को सीमित जिम्मेदारी या लिमिटेड लायबिलिटी (Limited Liability) कहां जाता है।

हर कंपनी को अपने नाम के आगे लिमिटेड (Limited) शब्द का प्रयोग करना कानून जरूरी है, इससे पता चलता है की उसके शेयरहोल्डर्स (Share Holders) की फाइनेंसियल लायबिलिटीज (Financial Liabilities) सीमित है।

शेयरहोल्डर होने के नाते आप अपने शेयर किसी और को बेच कर, उन्हें कंपनी में अपने अधिकार सौंप सकते हैं।

कंपनी के शेयर (Share) चल संपत्ति या मूवेबल प्रॉपर्टी (Movable Property) होती हैं जिन्हें खरीदना, बेचना, गिफ्ट के रूप में देना, वसीयत के जरिए (To make a will) देना या अन्य किसी लीगल (Legal) तरीके से किसी को भी दीया जा सकता है।

शेयरहोल्डर्स (Share Holders) रूपी मालिकों के बदलने पर कंपनी के स्वरूप में किसी प्रकार का कोई फर्क नहीं पड़ता है।

शुरुआत में कंपनी को बनाते समय इसके शेयरों के फेस वैल्यू (Face Value) के अनुसार सीधे कंपनी को पैसे देकर शेयर खरीदा जाता है। इसीसे कंपनी का शुरुआती कैपिटल (Capital) आता है। उसके बाद शेयर मार्केट (Share Market) में होने वाले ट्रांजैक्शन (Transactions) से कंपनी पर कोई असर नहीं पड़ता।

कंपनियां कितने प्रकार की होती है? – How many Types of Companies?

कंपनियां दो प्रकार की होती है :-

  • पब्लिक लिमिटेड (Public Limited) : पब्लिक लिमिटेड कंपनियों को अपने नाम के आगे केवल लिमिटेड (Limited) लगाना होता है। शेयर मार्केट (Share Market) में पब्लिक लिमिटेड (Public Limited) कंपनियों के ही शेयर में इन्वेस्टमेंट (Investment) किया जाता है।
  • प्राइवेट लिमिटेड (Private Limited) : प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों को अपने नाम के आगे प्राइवेट लिमिटेड शब्द लगाना अनिवार्य होता है। शेयर मार्केट में प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों के शेयर खरीदें और बेचे नहीं जाते हैं।

कंपनी के मेंबर्स की लिस्ट – Companies’s Members List

शेयरहोल्डरो को कंपनी के मेंबर (Members) के रूप में जाना जाता है। हर कंपनी अपने मेंबर्स की एक लिस्ट रखती है जिसे रजिस्टर ऑफ मेंबर्स (Register of Members) कहा जाता है।

इस लिस्ट में हर शेयरहोल्डर का नाम, एड्रेस और उससे रिलेटेड जरूरी इंफॉर्मेशन (Information) होती है।

आजकल, यह इंफॉर्मेशन (Informations) दोनों डिपॉजिटरी (Depository) के पास रखी जाती है।

यह है :-

  • नेशनल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड ( NSDL)-National Security Depository Limited
  • सेंट्रल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड (CDSL)-Central Security Depository Limited

इस लिस्ट से डिपॉजिटरी (Depository) को इन्वेस्टर्स (Investors) तक डिविडेंड (Divideds), राइट्स शेयर (Right Shares) या बोनस शेयर (Bonus Shares) आदि पहुंचाने में सुविधा रहती है।

वार्षिक रिपोर्ट (एनुअल रिपोर्ट) – Annual Report

हर कंपनी अपने कामकाज और अकाउंट्स (Accounts) की जानकारी के साथ एक एनुअल रिपोर्ट (Annual Report) तैयार करती है। यह रिपोर्ट सभी शेयरहोल्डर्स (Sahre Holders) को कंपनी की एनुअल जनरल मीटिंग (Annual General Meeting)-AGM से कुछ दिन पहले भेज दी जाती है।

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एनुअल रिपोर्ट (Annual Report) के साथ में कंपनी की बैलेंस शीट (Balance Sheet) और प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट स्टेटमेंट (Profit and Loss Account Statement) भी होता है। इस रिपोर्ट में कंपनी के कारोबार की स्थिति, भविष्य की पॉसिबिलिटी डिविडेंड (Dividend) की घोषणा और ऐसी कई बातों का वर्णन होता है।

इन्वेस्टर्स (Investors) और शेयरहोल्डर्स (Share Holders) को इस रिपोर्ट से कंपनी के बारे में काफी इनफॉरमेशन (Informations) मिल सकती है।

शेयर कितने प्रकार के होते है? – How Many Types of Shares ?

शेयर दो प्रकार के होते हैं :-

  • प्रेफरेंस शेयर (Preference Share)
  • इक्विटी शेयर (Equity Share)

प्रेफरेंस शेयर (Preference Share)

प्रेफरेंस शेयर (Preference Share) पर डिविडेंड (Dividend) रेट पहले से तय होती है। कंपनी के बंद हो जाने की स्थिति में प्रेफरेंस शेयरहोल्डर्स (Preference Share Holders) को डिविडेंड (Dividend) और कैपिटल (Capitals) का भुगतान इक्विटी शेयरहोल्डर्स (Equity Share Holders) से पहले होता है।

कई बार प्रॉफिट (Profit) नहीं होने पर कंपनी प्रेफरेंस शेयरहोल्डर्स (Preference Share Holders) को डिविडेंड नहीं दे पाती है। ऐसे हालात में इन शेयरों पर बकाया डिविडेंड (Dividend) खत्म होने की जगह पर इकट्ठा होता रहता है और जब कंपनी के पास पैसा आता है तो पिछला सारा बकाया डिविडेंड चुका दिया जाता है। तब तक इक्विटी शेयरहोल्डर्स (Equity Share Holders) को कोई डिविडेंड नहीं दिया जाता है।

अतः प्रेफरेंस शेयरहोल्डर्स (Preference Share Holders) को कंपनी के प्रॉफिट (Profit) और लॉस (Loss) की परवाह किए बिना अपने तय डिविडेंड (Dividend) का लाभ हमेशा रहता है।

इक्विटी शेयर (Equity Share)

इक्विटी शेयरों (Equity Shares) पर डिविडेंड (Dividend) मिलने की कोई गारंटी नहीं होती है।

आमतौर पर इक्विटी शेयरहोल्डरो (Equity Share Holders) को कंपनी का मालिक माना जाता है। इसलिए सभी लेनदारों और प्रेफरेंस शेयरहोल्डर्स (Preference Share Holders) की बकाया राशि चुकाने के पश्चात कंपनी के पास जो प्रॉफिट या रिजर्व फंड (Reserve Fund) बचता है, केवल उसी पर इक्विटी शेयरहोल्डर्स (Equity Share Holders) का अधिकार बनता है।

इक्विटी शेयरहोल्डर्स (Equity Share Holders) कंपनी के कुल शेयरहोल्डरो (Share Holders) का एक बड़ा हिस्सा होते हैं जो कंपनी के सभी मामलों में संपूर्ण मत का अधिकार रखते हैं। कंपनी को अच्छा प्रॉफिट (Profit) होने पर उसका सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं शेयरहोल्डरो (Share Holders) को जाता है और नुकसान होने पर उसका भार भी इन्हीं पर पड़ता है।

कंपनी के डेवलपमेंट (Development) और ग्रोथ (Growth) होने पर सबसे ज्यादा फायदा इक्विटी शेयरहोल्डर्स (Equity Share Holders) को होता है। अधिक प्रॉफिट होने पर इक्विटी शेयरों पर डिविडेंड (Dividend) बढ़ता जाता है और साथ ही कंपनी की ग्रोथ होने पर इक्विटी शेयर के प्राइस (Prize) भी बढ़ जाते हैं।

इक्विटी शेयरहोल्डर्स (Equity Share Holders) को समय-समय पर कंपनी के राइट (Rights)और बोनस (Bonus) शेयर भी मिलते हैं।

अतः इक्विटी शेयरों (Equity Shares) पर ज्यादा रिस्क (Risk) होता है और उसी के हिसाब से ज्यादा प्रॉफिट या नुकसान बना रहता है।

राइट्स शेयर किसे कहते हैं ? – What is Rights Share ?

बिजनेस को बढ़ाने या नया बिजनेस करने के लिए कंपनियों को समय-समय पर अतिरिक्त कैपिटल (Additional Capital) की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए कंपनियां अपने एक्जिस्टिंग शेयरहोल्डर्स (Existing Shareholders) को नए इक्विटी शेयर बेचती है। इसे ही राइट्स शेयर (Rights Shares) कहते हैं।

जिस शेयरहोल्डर (Share Holder) के पास जितने शेयर होते हैं, उसी के हिसाब से उन्हें राइट्स शेयर (Rights Share) बेचे जाते हैं।

राइट्स शेयर का प्राइस एट पार (At Par) या प्रीमियम (Premium) पर रखा जाता है।

अगर नए शेयर उसी प्राइस पर बेचे जाते हैं जिस पर कंपनी ने पुराने शेयर बेचे थे तो उसे एट पार (At Par) कहा जाता है और यदि नए शेयरों का प्राइस पहले से ज्यादा हो तो उन्हें प्रीमियम (Premium) कहते हैं। नए और पुराने शेयरों के प्राइस का अंतर ही प्रीमियम (Premium) होता है।

बोनस शेयर किसे कहते हैं?- What is Bonus Shares ?

कंपनियां अपने प्रॉफिट में से शेयरहोल्डर को डिविडेंड (Dividend) देती है। सारा प्रॉफिट डिविडेंड के रूप में ना दे कर उसका एक बड़ा भाग कंपनी अपने पास रिजर्व फंड (Reserve Fund) में रखती है। इस फंड का उपयोग भविष्य में कंपनी की ग्रोथ के लिए या फिर किसी भी प्रकार की अनएक्सपेक्टेड कठिनाइयों से निपटने के लिए किया जाता है।

सभी प्रॉफिट बनाने वाली कंपनियां धीरे धीरे बड़ा रिजर्व फंड बना लेती हैं और साथ ही में इन कंपनियों का बिजनेस सेल्स और असेट्स में भी ग्रोथ (Growth) होती है। ऐसे में कई कंपनियों को लगता है कि उनकी कैपिटल (Capital) इस बढ़ते बिजनेस के बोझ को नहीं संभाल पा रही है। इस प्रकार से कम कैपिटल (Capital) के आधार पर बिजनेस को बढ़ाना कंपनी के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

अतः कैपिटल को बढ़ाने के लिए कंपनियां अपने रिजर्व (Reserve) से अपने शेयरहोल्डर्स को बोनस शेयर (Bonus Shares) जारी करती है।

शेयरहोल्डर्स के पास कंपनी के जितने शेयर होते हैं, उसी अनुपात में बोनस शेयर (Bonus Shares) फ्री (Free) में दिए जाते हैं।

यह मूलतः कंपनी के अकाउंट का हिसाब है, जिसमें रिजर्व से पैसा निकाल कर इक्विटी कैपिटल के अकाउंट में डाल दिया जाता है। इस प्रकार से कंपनी, और लोगों को शामिल किए बिना नई कैपिटल (New Capital) का उपयोग कर सकती है।

बोनस शेयरों (Bonus Shares) के फ्री (Free) में जारी (Issue) होने के कारण शेयर मार्केट में कंपनी के शेयर प्राइस गिरने लगते हैं, इससे जितना नुकसान होता है उससे कहीं अधिक फायदा फ्री में बोनस शेयर (Bonus Share) मिलने से होता है।

दरअसल शेयरों का प्राइस आमतौर पर उस अनुपात में नहीं गिरता जिस अनुपात में बोनस शेयर (Bonus Share) जारी किए जाते हैं।

शेयरहोल्डर्स को बोनस शेयर से एक फायदा यह भी मिलता है कि, अधिकतर कंपनियां बोनस शेयर जारी करने के बाद भी पहले जितना ही डिविडेंड (Dividend) देती है।

स्टॉक एक्सचेंज क्या होता है ? – What is Stock Exchange ?

स्टॉक एक्सचेंज, शेयरो और सिक्योरिटीज की खरीद फरोख्त के लिए बना एक बाजार है, इसलिए इसे शेयर बाजार (Share Market), स्टॉक मार्केट (Stock Market) या स्टॉक बाजार भी कहते हैं।

सिक्योरिटीज में इक्विटी और प्रेफरेंस शेयर डिवेंचर और गवर्नमेंट एवं नॉन गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन के बांन्डस शामिल होते हैं।

भारत में दो ही नेशनल लेवल के स्टॉक एक्सचेंज हैं :-

  • बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) – Bombay Stock Exchange
  • नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) – National Stock Exchange

स्टॉक बाजार (Stock Market) में शेयर (Share) खरीदने और बेचने के लिए ऑथराइज ब्रोकर (Authorized Broker) की आवश्यकता होती है। उन्हें स्टॉक ब्रोकर (Stock Broker) या शेयर ब्रोकर (Share Broker) कहते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें ब्रोकरेज (Brokerage) या कमीशन मिलती है।

भारतीय स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange) पर केवल लिस्टेड सिक्योरिटीज (Listed Securities) का ही कारोबार होता है। लिस्टेड शेयरों को खरीदना और बेचना तो आसान होता ही है और साथ ही उनका कारोबार स्टॉक एक्सचेंज के रूल्स एंड रेगुलेशन (Rules and Regulation) से बंधा होने के कारण इन्वेस्टर्स (Investor) का ज्यादा भरोसा रहता है।

मल्टीनेशनल कंपनियां किसे कहते है ? – What is Multinational Companies ?

वे कंपनी जिनके इक्विटी कैपिटल्स (Equity Capital) में विदेशी कंपनियों का स्वामित्व या मालिकाना हक अधिक होता है। उन कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियां या मल्टीनेशनल कंपनी (Multinational Companies) कहते हैं।

आमतौर पर इन कंपनियों के शेयर (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करना अच्छा साबित होता है।

ब्लू चिप कंपनियां किसे कहते है ? – What is Blue Chip Companies ?

आमतौर पर ब्लू चिप कंपनियों ( Blue Chip Companies )के शेयरों (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करना अच्छा इन्वेस्टमेंट (Investment) माना जाता है।

इसमें अधिकतर वे कंपनियां शामिल होती है, जिनका कारोबार काफी बड़ा होता है, जो हाई टेक्नोलॉजी (High Technology) का उपयोग करते हैं, उनका मैनेजमेंट स्ट्रांग (Management Strong) होता है और समय समय पर डिविडेंड (Dividend) भी देते हैं।

ब्लू चिप कंपनियों ( Blue Chip Companies ) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है।

बुल मार्केट और बियर मार्केट क्या होता है ? – What is Bull Market and Bear Market ?

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अधिकतर सटोरिया या तो बुल (Bull)-तेजड़िये होते हैं या बियर (Bear)-मदड़िये

बुल (Bull), मार्केट के प्रति आशावादी होते हैं और भविष्य में शेयरों के प्राइस बढ़ने की उम्मीद रखते हैं। इसलिए यह लोग करंट प्राइस (Current Price) पर अपने पसंद के शेयर (Share) खरीदते हैं, ताकि प्राइस बढ़ने पर उन्हें प्रॉफिट (Profit) पर बेच सकें।

बुल (Bull) के अधिक कारोबार करने से शेयर मार्केट में तेजी आ जाती है और अधिकतर शेयरों के प्राइस चढ़ने लगते हैं। ऐसे मार्केट को बुल मार्केट (Bull Market) कहा जाता है।

इसके विपरीत बियर (Beer), बाजार (Market) के प्रति निराशावादी होते हैं और आशा करते हैं कि कि भविष्य में शेयर प्राइस (Share Price) गिरेंगे। ये लोग करंट प्राइस पर शेयर को बेच देते हैं ताकि प्राइस गिरने पर उसे दोबारा खरीद सकें।

बियर (Bear) के अधिक प्रभाव से बाजार में मंदी आ जाती है और इसे बियर मार्केट (Bear Market) कहा जाता है।

शेयरों में बाय-बैक किसे कहते है ? – What is Share Buyback

जब कंपनी अपनी कैपिटल से अपने ही शेयर (Share) वापस खरीदने लगे तो, इसे बायबैक (BuyBack share) कहते हैं।

शेयरों में बायबैक (BuyBack share) से कंपनी का इक्विटी कैपिटल (Equity Capital) कम हो जाता है क्योंकि मार्केट से वापस खरीदे गए शेयर खारिज हो जाते हैं और कंपनी एक्ट के अनुसार इन शेयरों को दोबारा जारी नहीं किया जा सकता हैं।

इस कारण से शेयर मार्केट में कंपनी के शेयर की उपलब्धता कम हो जाती है। इससे EPS (अर्निंग पर शेयर-Earning Per Share) बढ़ जाता है, क्योंकि कंपनी को होने वाला नेट प्रॉफिट (Net Profit) पहले से कम इक्विटी कैपिटल पर बांटना होता है।

किसी कंपनी के शेयरों में बायबैक (BuyBack share) का प्राइस मार्केट के करंट प्राइस से ज्यादा और कई बार बहुत ज्यादा होता है। इससे इन्वेस्टर्स को बहुत ज्यादा प्रॉफिट होता है।

स्टॉक स्प्लिट क्या होता है ? – What is Stock Split – शेयर विभाजन

स्टॉक स्प्लिट (Stock Split) या शेयरों में विभाजन बोनस इश्यू से बिल्कुल अलग होता है।

बोनस (Bonus) इश्यू करने के लिए कंपनी के अकाउंट्स में रिजर्व से पैसा का उपयोग करते हैं, जिससे कंपनी का इक्विटी कैपिटल बढ़ जाता है।

जबकि, स्टॉक स्प्लिट (Stock Split) में कंपनी के मौजूदा शेयर की फेस वैल्यू (Face Value) को कम फेस वैल्यू में विभाजित कर दिया जाता है जिससे कंपनी के इक्विटी कैपिटल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

स्टॉक स्प्लिट से इन्वेस्टर्स को फायदा होता है क्योंकि शेयर पहले के मुकाबले सस्ता हो जाता है। इससे शेयर में खरीदारों की रुचि बढ़ती है और बाजार में उसके प्राइस चढ़ने लगते हैं।

शेयरों का डिमैटेरियलाइजेशन क्या होता है ?- What is Dematerialisation of Shares

शेयरों के पेपर फॉर्मेट शेयर सर्टिफिकेट्स (Share Certificates) को डिजिटल फॉर्मेट (Digital Format) में रखने को डिमैटेरियलाइजेशन ( Dematerialisation) कहते हैं।

यह परिवर्तन डिपॉजिटरी (Depository) के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार से इन्वेस्टर्स (Investors) के शेयर डीमेट (Demat) रूप में डिपॉजिटरी (Depository) के पास रहते हैं।

भारत में दो डिपॉजिटरी (Depository) हैं :-

  • CDSLसेंट्रल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (Central Securities Depository Limited) : जो BSE का डिपॉजिटरी (Depository) है।
  • NSDLनेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (National Securities Depository Limited) : जो NSE का डिपॉजिटरी (Depository) है।

डिपॉजिटरीज (Depository) को एक सिक्योरिटी बैंक (Security Bank) के रूप में देखा जा सकता है जहां कस्टमर्स (Customers) अपने शेयर (Share) और बॉन्ड्स (Bonds) डिजिटल रूप में जमा कराते हैं।

बैंक की तरह ही डिपॉजिटरीज (Depository) अपने कस्टमर्स को उनके अकाउंट का हिसाब-किताब, अकाउंट होल्डिंग स्टेटमेंट (Account Holding Statement) और अकाउंट ट्रांजैक्शन स्टेटमेंट (Account Transaction Statement) के जरिए देता है।

कस्टमर्स के डिपॉजिटरी ( (Depository) की सेवाएं जिस एजेंट के माध्यम से मिलती है उन्हें डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (Depository Participant) कहते हैं। डीपी (DP) का काम बैंक (Bank), फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) या ब्रोकर (Broker) करते हैं।

डिमैटेरियलाइजेशन के लाभ – Benefits of Demitarialization

  • डीमेट शेयर खरीदने पर इनके नकली, झूठे होने या चुराने का खतरा नहीं रहता है।
  • डीमेट शेयर खरीदने पर समय और विभिन्न प्रकार के खर्चों की बचत होती है।
  • इन शेयरों में नॉमिनेशन की सुविधा उपलब्ध होती है।
  • डीमेट प्रणाली से छोटे इन्वेस्टर को बहुत फायदा होता है क्योंकि, अब वह महंगे शेयर कम संख्या में खरीद सकते हैं।
  • इस सिस्टम में एड्रेस बदलने पर अलग-अलग कंपनियो के स्थान पर सिर्फ डीपी (DP) को इनफॉर्म करना होता है।
  • इन शेयरों पर मिलने वाला बोनस और राइट शेयर बिना किसी देरी के अकाउंट में जमा हो जाते हैं।

रीमैटेरियलाइजेशन – Rematerialisation

इसमें शेयरों को डीमेट रूप से वापस पेपर शेयर सर्टिफिकेट ने बदल दिया जाता है।

कंप्यूटराइज बिजनेस किसे कहते है ?- What is Computaries Business

स्टॉक एक्सचेंज में खड़े होकर बोली लगाने की जगह अब बोल्ट (BOLT) या नीट (NEAT) सिस्टम से शेयरों का कारोबार होता है।

बोल्ट (BOLT) बीएसई (BSE) का कंप्यूटराइज बिजनेस सिस्टम है और नीट (NEAT) एनएससी (NSE) का।

इस सिस्टम की सहायता से अब शेयरों (Shares) का कारोबार नेशनल लेवल पर एक ऑटोमेटिक कंप्यूटराइज नेटवर्क के माध्यम से तत्काल हो जाता है।

ब्रोकर (Broker) अब स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange) में जाने की जगह अपने ऑफिस में लगे कंप्यूटर से अपने कस्टमर्स के लिए शेयर खरीदे और बेचते हैं।

कंप्यूटराइज सिस्टम से इन्वेस्टर्स और बिजनेसमैन का विश्वास व हौसला भी बड़ा है। वह सब अपने सोदे ठीक उसी प्राइस पर कर सकते हैं जिस पर वे चाहते हैं। इस तरह से शेयरों के कारोबार में अब पहले से कहीं अधिक ट्रांसपेरेंसी आई है।

फ्यूचर्स – Futures व ऑप्शंस – Options

भारत मे फ्यूचर्स (Futures) कारोबार की शुरुआत सन 2001 से हुई है।

फ्यूचर्स (Futures) और ऑप्शंस (Options) अनुभवी बिजनेसमैन और सट्टेबाजों का काम है।

फ्यूचर्स – Futures

इन फ्यूचर्स (Futures) बाजार में किसी शेयर को खरीदते या बेचते समय शेयर प्राइस के स्थान पर सौदे में हुए प्रॉफिट या लॉस का भुगतान किया जाता है। इसमें शेयर की डिलीवरी का कोई प्रोविजन नहीं होता है।

फ्यूचर्स बाजार में केवल कुछ चुनिंदा शेयरों का ही कारोबार किया जाता है। इन शेयरों का चयन एक्सचेंज द्वारा उनकी उपलब्ध मात्रा, मार्केट केपीटलाइजेशन (Market Capitalization) व खरीदे या बेचे गए शेयरों की संख्या के आधार पर किया जाता है।

इन चुने हुए शेयरों (Shares) की एक तय संख्या को मिलाकर एक कॉन्ट्रैक्ट (Contract) बनता है।

उदाहरणार्थ :

माना कि फ्यूचर्स बाजार में हिंदुस्तान लीवर के कॉन्ट्रैक्ट (Contract) में शेयरों की संख्या 1000 तय की गई है। तब फ्यूचर्स बाजार में बिजनेसमैन 1000 या उस से गुना किसी संख्या में ही हिंदुस्तान लीवर के शेयर फ्यूचर्स खरीद और बेंच सकते हैं।

फ्यूचर्स बाजार में खरीदें गए शेयरों के पैसे नहीं देने पड़ते। केवल मार्जिन मनी (Margin Money) अदा करते हैं, जो आपके द्वारा खरीदे गए शेयरों के कुल मूल्य का 10% से 20% हो सकता है।

विभिन्न कॉन्ट्रैक्टो का मार्जिन मनी समय-समय पर स्टॉक एक्सचेंज द्वारा तय किया जाता है।

फ्यूचर्स कारोबार शेयर व्यापारियों के लिए बहुत आकर्षक माना जाता है क्योंकि आज के परिवेश में ₹1,000 या ₹1,00,000 का मार्जिन मनी चुका कर उससे कई गुना अधिक वैल्यू के शेयर खरीद सकते हैं।

पर यह एक दो धारी तलवार है, जिसमें अधिक प्रॉफिट के चक्कर में भारी नुकसान भी झेलना पड़ सकता है।

ऑप्शंस – Options

ऑप्शंस (Options) भी एक प्रकार का फ्यूचर्स (Futures) कारोबार है।

जब आप किसी कॉन्ट्रैक्ट पर ऑप्शंस (Options) खरीदते हैं तो, आप कॉन्ट्रैक्ट की अवधि समाप्त होने से पहले उसे किसी भी ऐसे प्राइस पर खरीदने या बेचने के अधिकार के लिए एक प्रीमियम (Premium) चुकाते हैं, जिस प्राइस में आपको प्रॉफिट हो या आपका नुकसान कम से कम हो।

अगर आप कॉन्ट्रैक्ट के समाप्त करने के इस ऑप्शन का उपयोग नहीं करते हैं तो ज्यादा से ज्यादा आपको उस प्रीमियम का नुकसान होगा जो आपने ऑप्शन खरीदने के लिए चुकाया था।

अतः फ्यूचर्स (Futures) की अपेक्षा ऑप्शंस (Options) अधिक सुरक्षित है क्योंकि, फ्यूचर्स में नुकसान की कोई सीमा नहीं होती है।

ऑप्शंस (Options) दो प्रकार के होते हैं :-

  • कॉल ऑप्शंस (Call Options)
  • पुट ऑप्शंस (Put options)

जो लोग शेयर बाजार में तेजी की उम्मीद रखते हैं वे आमतौर पर कॉल ऑप्शन खरीदते हैं और इसके विपरीत जो मंदी की उम्मीद रखते हैं वह लोग पुट ऑप्शन खरीदते हैं।

ऑप्शंस कारोबार काफी जटिल होता है, जिसमें बहुत अनुभव की आवश्यकता होती है।

फंडामेंटल एनालिसिस (मूलभूत विश्लेषण) क्या होता है ? – What is Fundamental Analysis ?

कई इन्वेस्टर्स (Investors) शेयरों (Shares) में पैसा इन्वेस्ट (Invest) करने से पहले इस टेक्निक (Technic) का प्रयोग करते हैं।

इन्वेस्टर (Investor) शेयर खरीदने से पहले कंपनी की सेल्स (Sales), प्रॉफिट (Profit), डिविडेंड (Dividend) और अन्य फाइनेंसियल एलिमेंट्स (Financial Elements) का अध्ययन करते हैं।

इन तथ्यों के आधार पर वे यह अनुमान लगाते हैं कि शेयर का राइट प्राइस (Right Price) क्या होना चाहिए और इसी प्राइस को शेयर का फंडामेंटल वैल्यू (Fundamental Value) या इंट्रिसिक वैल्यू (Intrinsic value) मानते हैं। इसी वैल्यू के आधार पर निर्णय लिया जाता है कि मार्केट में शेयर का प्राइस ज्यादा चल रहा है या कम।

ऐसे इन्वेस्टर (Investor) कम प्राइस पर शेयर खरीदते हैं और ज्यादा प्राइस पर उन्हें बेचकर पैसा बनाते हैं।

टेक्निकल एनालिसिस क्या होता है ? – What is Technical Analysis

कुछ इन्वेस्टर्स (Investors) शेयर (Share) खरीदने या बेचने से पहले उनका टेक्निकल एनालिसिस (Technical Analysis) करते हैं।

ये लोग शेयर के प्राइस में आए पिछले अप एंड डाउन (UP & Down) के आधार पर अंदाजा लगाते हैं की भविष्य में उस शेयर का प्राइस क्या होगा ? इसके लिए यह लोग प्राइस के चार्ट (Charts) या ग्राफ (Graphs) की मदद लेते हैं।

टेक्निकल एनालिसिस (Technical Analysis) में चार्ट या ग्राफ से किसी इंडिविजुअल शेयर (Individual Share) के प्राइस का एक पैटर्न मिल जाता है जो अक्सर भविष्य में खुद को रिपीट करता है। इस तरह भविष्य के प्राइस का अंदाजा लगा कर उसके अनुसार शेयर खरीद या बेच कर इन्वेस्टर्स (Investors) प्रॉफिट बनाते हैं।

शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट (Short trem Investment) के लिए टेक्निकल एनालिसिस (Technical Analysis) ज्यादा उपयोगी होता है, लेकिन लोंग टर्म इन्वेस्टमेंट (Long Term Investment) का आधार फंडामेंटल एनालिसिस (Fundamental Analysis) ही होना चाहिए।

भारत का प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) – Securities and Exchange Board of India (SEBI)

सेबी (SEBI) पार्लियामेंट (Parliament) से पास एक्ट (Act) के अंतर्गत बनी एक इंडिपेंडेंट संस्था (Independent Institution) हैं। इसका संचालन एक वैधानिक बोर्ड (Statutory Board) करता है, जिसमें 6 सदस्य (Members) और एक चेयरमैन (Chair-man) होता है।

सेबी (SEBI) का काम इन्वेस्टर्स (Investors) के हितों की रक्षा करना और भारत के सभी सिक्योरिटीज मार्केट (Securities Market) और स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange) को रेगुलेट (Regulate) कंट्रोल (Control) और डेवलपमेंट (Development) करना होता है।

शेयर मार्केट इंडेक्स क्या होता है? – What is Stock Market Index ?

Shares-invest

शेयर मार्केट इंडेक्स (Share Market Index) का मुख्य उद्देश्य होता है, बाजार में शेयरों के प्राइस की मूवमेंट (Movement) को आंकना।

इंडेक्स (Index) एक मेजरमेंट इंस्ट्रूमेंट (Instrument) के जैसा है, जो शेयर मार्केट के बिहेवियर (Behaviour) का जायजा लेता है।

आमतौर पर इंडेक्स (Index) उन चुनिंदा शेयरों का एवरेज (Average) होता है, जो लगभग पूरे शेयर मार्केट (Share Market) का रिप्रजेंटेशन (Representation) करते हैं।

इन चुने हुए शेयरों का मार्केट में लिक्विडिटी (Liquidity) का स्तर अधिक होता है और यह शेयर लोगों के पास काफी मात्रा में होते हैं। इनकी मार्केट केपीटलाइजेशन (Market Capitalization) बहुत अधिक होती है और इनमें काफी मात्रा में कारोबार होता है।

इंडेक्स (Index) ही पूरे बाजार (Share Market) का आईना होता है।

भारत का सबसे अधिक प्रयोग होने वाला इंडेक्स है सेंसेक्स (Sensex) जोकि बीएसई (BSE) का सेंसिटिव इंडेक्स (Sensitive index) है।

सेंसेक्स (Sensex) का गठन 1986 में किया गया था। लेकिन सेंसेक्स (Sensex) का बेस ईयर 1978-79 रखा गया और उस वर्ष में सेंसेक्स (Sensex) का वैल्यू 100 मान लिया गया।

सेंसेक्स (Sensex) में 30 शेयर होते हैं, जिनका चयन उनके दैनिक कारोबार के आधार पर होता है। हर शेयर को मार्केट में उसके केपीटलाइजेशन (Capitalization) से आंका जाता है। इसलिए शेयरों के प्राइस (Share Price) में किसी भी बदलाव से सेंसेक्स (Sensex) बहुत जल्दी प्रभावित होता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण इंडेक्स (Index) है – s&p सीएनएक्स (S&P CNX) इंडेक्स, जिससे अधिकतर निफ्टी (Nifty) के नाम से जाना जाता है। यह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange) का मुख्य इंडेक्स (Index) है। जिसमें अलग-अलग सेक्टर से 50 शेयर शामिल है।

इसी लिए इसे निफ़्टी-50 (Nifty50) कहते है।

सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) में शामिल शेयरों की लिस्ट, इनमे शामिल शेयरों के बदलते मार्केट केपीटलाइजेशन (Market Capitalization) व कारोबार की मात्रा के साथ बदलती रहती है। इन शेयरो की लिस्ट बीएसइ (BSE) व एनएसइ (NSE) की साइट पर मिल जाएगी।

www.bseindia.com तथा www.nseindia.com

इन्वेस्टमेंट के 3 मूल नियम – 3 Basic Rules of Investment

1. केवल लिस्टेड शेयर ही खरीदें – Only Buy Listed Shares :

शेयर इन्वेस्टमेंट का पहला नियम है, कि केवल और केवल लिस्टेड कंपनियों में ही पैसे का इन्वेस्ट करें।

2. इनएक्टिव शेयर ना खरीदें – Not Buy Inactive Share :

एक्टिव शेयर (Avtive Share) वह होते हैं जिनमें रोज या लगभग रोज ही स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार होता है और दूसरी ओर इनएक्टिव शेयर (Inactive Share) वे होते हैं, जिनमें महीने में केवल दो बार या इससे कम कारोबार होता है।

आपको उन्हीं शेयरो (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करना चाहिए जिसे आसानी से बेचा जा सके।

एक्टिव (Active) और इनएक्टिव (Inactive) शेयरो (Shares) का कोई तय क्लासिफिकेशन नहीं है। जो शेयर आज इनएक्टिव (Inactive) है वह कल एक्टिव (Avtive) हो सकता है, वहीं दूसरी ओर इसका ठीक उल्टा भी हो सकता है।

3. कम शेयर होल्डर्स वाली कंपनी में इन्वेस्ट ना करें – Do not Invest in Low Stock Holder’s Company

कम शेयरहोल्डरो (Share Holders) वाली कंपनियां के शेयर प्राय: स्टेबल नहीं होते हैं। जब इन शेयरों का प्राइस चढ़ता है तो बहुत तेजी से चढ़ते हैं और काफी ऊंचे स्तर तक पहुंच जाते हैं। उसी तरह यह शेयर बहुत जल्दी गिर भी जाते हैं।
अतः जब इन शेयरों के प्राइस चढ़ते हैं तो इन्हें खरीदना बहुत कठिन होता है और प्राइस गिरने पर बेचना भी कठिन होता है।

सारांश

आपको बहुत से लोग सचेत करेंगे कि शेयरों में इन्वेस्ट (Invest in Shares) करना हर किसी के बस की बात नहीं है। पर्याप्त जानकारी के बिना शेयरों में इन्वेस्ट (Invest in Shares) करना खतरनाक हो सकता है। आपको यह समझना होगा कि शेयरों में पैसा लगाने का फैसला किसी बिजनेस में पैसा लगाने के फैसले से कम नहीं है।

क्या आप अपना पैसा किसी भी बिजनेस में बिना सोच विचार किए लगा देंगे ?

कतई नहीं !!

इसलिए किसी शेयरों में इन्वेस्ट (Invest in Shares) करने से पहले आपको उस शेयर और उसके उद्योग की समझ हासिल करनी होगी।

उम्मीद करते हैं कि यह आर्टिकल आपको शेयर में निवेश (Invest in Shares) करने से पहले शेयर के बारे में वह सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं में मदद करेगा।

लोग यह भी पूछते हैं – People Also Ask

कंपनियां कि इक्विटी कैपिटल क्या होती है?-What is the Equity Capital?

शुरुआती कैपिटल शेयरहोल्डर्स (Share Holders) से लिया जाता है, जिसे इक्विटी कैपिटल (Equity Capital) कहते हैं।

कैपिटल क्या होती है?-What is the Capital?

बिजनेस शुरू करने के लिए और उसे चालू रखने के लिए जो धन या पैसा लगाया जाता है, उसे कैपिटल (Capital) कहते हैं।

कंपनी क्या होती है?-What is the Company?

कंपनी (Company) एक प्रकार का बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन (Business Organization) होता है जिसे कुछ शेयरहोल्डर्स (Share holders) मिलकर बिजनेस करने के लिए का गठित करते हैं।

कंपनीज़ कितने प्रकार की होती है? – How many Types of Companies?

कंपनियां दो प्रकार की होती है :-
1. पब्लिक लिमिटेड (Public Limited)
2. प्राइवेट लिमिटेड (Private Limited)

डिबेंचर होल्डर किसे कहते है? – Who is the debenture holder?

डिबेंचर खरीदने वाले इन्वेस्टर (Investor) को डिबेंचर होल्डर (Debenture Holder) कहा जाता है।

लिमिटेड लायबिलिटी क्या होती है?-What is the Limited Liability?

कंपनी के दिवालिया (Bankrupt) घोषित होने की स्थिति में शेयरहोल्डर्स को कंपनी या उसके कर्जदारो (Borrowers) को कोई पैसा देने के लिए नहीं कहा जा सकता। इस नियम को सीमित जिम्मेदारी या लिमिटेड लायबिलिटी (Limited Liability) कहां जाता है।

डिपॉजिटरी (Depository)कितने प्रकार की होते है ?-How many Types of Depositories?

डिपॉजिटरी (Depository) दो प्रकार की होती है :-
1. नेशनल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड ( NSDL)-National Security Depository Limited
2. सेंट्रल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड (CDSL)-Central Security Depository Limited

शेयर कितने प्रकार के होते है? – How Many Types of Shares ?

शेयर दो प्रकार के होते हैं:-
1. प्रेफरेंस शेयर (Preference Share)
2. इक्विटी शेयर (Equity Share)

राइट्स शेयर किसे कहते हैं ? – What is Rights Share ?

बिजनेस को बढ़ाने या नया बिजनेस करने के लिए कंपनियों को समय-समय पर अतिरिक्त कैपिटल (Additional Capital) की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए कंपनियां अपने एक्जिस्टिंग शेयरहोल्डर्स (Existing Shareholders) को नए इक्विटी शेयर बेचती है। इसे ही राइट्स शेयर (Rights Share) कहते हैं।


बोनस शेयर किसे कहते हैं?- What is Bonus Share?

कैपिटल को बढ़ाने के लिए कंपनियां अपने रिजर्व (Reserve) से अपने शेयरहोल्डर्स को बोनस शेयर (Bonus Share) जारी करती है।

स्टॉक एक्सचेंज कितने प्रकार के होते है? – How Many Types of Stock Exchange?

भारत में दो नेशनल लेवल के स्टॉक एक्सचेंज  हैं :-
1. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) – Bombay Stock Exchange
2. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) – National Stock Exchange

स्टॉक ब्रोकर किसे कहते है? – What is Stock Broker?

स्टॉक बाजार (Stock Market) में शेयर (Share) खरीदने और बेचने के लिए आपको ऑथराइज ब्रोकर (Authorized Broker) की आवश्यकता होती है। उन्हें स्टॉक ब्रोकर (Stock Broker) या शेयर ब्रोकर (Share Broker) कहते हैं।

मल्टीनेशनल कंपनी किसे कहते है? – What is Multinational Companies?

वे कंपनी जिनके इक्विटी कैपिटल्स (Equity Capital) में विदेशी कंपनियों का स्वामित्व या मालिकाना हक अधिक होता है।  उन कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियां या मल्टीनेशनल कंपनी (Multinational Companies) कहते हैं।

बायबैक किसे कहते है? – What is Buyback?

जब कंपनी अपनी कैपिटल से अपने ही शेयर (Share) वापस खरीदने लगे तो, इसे बायबैक (BuyBack share) कहते हैं।

डिमैटेरियलाइजेशन किसे कहते है? – What is Dematerialisation?

शेयरों के पेपर फॉर्मेट शेयर सर्टिफिकेट्स (Share Certificates) को डिजिटल फॉर्मेट (Digital Format) में रखने को डिमैटेरियलाइजेशन ( Dematerialisation) कहते हैं।

ऑप्शंस कितने प्रकार के होते है? – How Many Types of Options?

ऑप्शंस (Options) दो प्रकार के होते हैं :-
1. कॉल ऑप्शंस (Call Options)
2. पुट ऑप्शंस (Put options)

स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने से पहले किसी को क्या सावधानी रखनी चाहिए? – What should be cautioned before investing in the stock market?

शेयर (Shares) में इन्वेस्ट (Invest) करने से पहले समझदारी बेहद जरूरी है। हमेशा उन व्यवसायों में इन्वेस्ट (Invest) करें जो अच्छी तरह से स्टेब्लिश हो।

शेयर किसे कहते है ? – What is Share ?

जब कोई कंपनी खुद को NSE या BSE से रजिस्टर करके अपनी कंपनी में इन्वेस्ट (Invest) बढ़ाने के लिए अपनी कंपनी के हिस्सों को बेचती है तब उस हिस्सेदारी को शेयर (Shares) कहा जाता है। जो भी व्यक्ति उस कंपनी के शेयर (Shares) को खरीदता है, वो उस कंपनी में उतने शेयर्स का हिस्सेदार बन जाता है।

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