यज्ञ क्या है? – What is Yagya?

हिंदू धर्म(Hindu Religion) में यज्ञ(Yagya) की परंपरा वैदिक काल(Vedic Time) से चली आ रही है।

धर्म ग्रंथों में मनोकामना पूर्ति व किसी बुरी घटना को टालने के लिए यज्ञ करने के कई प्रसंग मिलते हैं। रामायण व महाभारत में ऐसे अनेक राजाओं का वर्णन मिलता है, जिन्होंने अनेक महान यज्ञ(Yagya) और हवन(Havan) किए थे।

देवताओं को प्रसन्न करने के लिए भी यज्ञ(Yagya) और हवन(Havan) कराने की परंपरा आज भी जारी है। इसे आज भी उतना ही शुभ फलदायी माना जाता है जितना कि पहले था।

आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से जानेगे की यज्ञ क्या होता है?(What is Yagya or Yajna), यज्ञ कितने प्रकार का होता है?(Types of Yagya) और क्या बेनिफिट्स है?(Benefits of yagya)

यज्ञ क्या है? – What is Yagya?

यज्ञ(Yajna) अग्नि पूजा(Fire worship) है।

आदिकाल से अग्नि(Agni) आदिमानव के ऊर्जा के स्त्रोत(Source of Energy) हैं। वह उससे उष्णता ग्रहण करते है, इसलिए उसकी उपासना और उससे मंगल कामना करते है। अग्नि(Agni) का आव्हान करते है, जिससे वह उसके जैसा सदा ऊर्जा से भरे रहे और कर्मठ, तत्पर, उत्साही, साहसीनिर्मिक बने।

यज्ञ(Yagya) को आर्यो(Aryan) से जोड़ा जाता है। वेदों(Vedas) में भी यज्ञ(Yagya) का वर्णन मिलता है। देवताओ और राक्षसों के बीच संघर्ष के लिए भी यज्ञ(Yagya) ही प्रमुख कारण था।

आर्य कृषि आधारित(Agricultural Based) थे तो उनके लिए वर्षा(Rain) जरूरी थी।

यज्ञ(Yagya) के द्वारा इंद्र की स्तुति होती और साथ ही अग्नि का पूजन भी होता था।

अग्नि ऋग्वेद(Rigveda) में प्रमुख देवता है। असल में अग्नि के पूजन से ही जंगल कृषि योग्य भूमि बनती है और यज्ञ की अग्नि से ही वृष्टि (पानी बरसना) होती है।

ऋग्वेद(Rigveda) के दूसरे सबसे प्रधान देवता इंद्र हैं और इनके द्वारा ही वर्षा होती है।

अग्नि और इंद्र दोनों का ही आव्हान यज्ञ में किया जाता है।

यज्ञ का उद्देश्य क्या है?-What is the Objective of Yagya?

यज्ञ(Yagya) योग की विधि है। यह प्रकृति(Nature) से जुड़ने की अद्भुत सनातन व्यवस्था(Sanatan System) है।

यज्ञ का प्रमुख उद्देश्य(Objective) धार्मिक प्रवृत्ति(Religious Tendency) के लोगों को सत् प्रयोजन(Purpose) के लिए संगठित करना और समूह में एकत्र होकर मंत्र(Mantra) उच्चारण के द्वारा मन और भाव को केंद्रित करना है।

यह प्रत्यक्ष रूप से अनेक इंद्रिय दोष को रोकती है और शारीरिक(Physical), मानसिक(Mental) और भावनात्मक (Emotional) रूप से व्यक्ति को शुद्ध(Pure) करती है।

सनातन व्यवस्था(Sanatan System) में सामूहिक प्रार्थना(Collective Prayer) को अधिक प्रभावशाली माना गया हैं।

यज्ञ के नियम क्या है? – What is the Rule of Yagya?

यज्ञ(Yagya) शुभ कार्य है, देव कार्य है। यह शुद्ध होने की प्रक्रिया है।

देवता से जोड़ने की पहली कंडीशन पवित्रता ही है। इसलिए यज्ञ में प्रयोग की जाने वाली हर वस्तु शुद्ध और पवित्र रखी जाती है। यज्ञ(Yagya) में शामिल होने वालों को भी मन, विचार,तन और व्यवहार से शान्त और पवित्र होना चाहिए। ऐसा करके एकाग्र(Concentrate) मन से मंत्रों(Mantras) और प्रार्थना(Prayer) द्वारा सर्वशक्तिमान ईश्वर(Almighty God) से जुड़ने का प्रयास करते हैं।

यज्ञ में किसका ध्यान किया जाता है?

यज्ञ(Yagya) में सूर्य का ध्यान किया जाता है। सूर्य से सारे विश्व में प्राण का संचार होता है। यह जीवन की उर्जा(Life Energy) का स्त्रोत है। इस ऊर्जा को प्राण शक्ति भी करते हैं।

वृक्ष(Tree), पशु(Animal) सीमित मात्रा में प्राण शक्ति धारण करते रहते हैं। मनुष्य में यह कैपेसिटी होती है कि वह ध्यान या मेडिटेशन(Meditation) और यज्ञ के द्वारा अपनी आवश्यकता के अनुरूप बड़ी मात्रा में प्राणशक्ति को धारण कर सकते है। इसी कारण शरीर से सामान्य दिखने वाले अनेक महापुरुषों ने असाधारण कार्य किए हैं।

यज्ञ का क्या अर्थ है? – What does Yagya Mean?

Yagya

यज्ञ के तीन प्रमुख अर्थ हैं :-

  • देव पूजा
  • दान, और
  • संगठित करना

यज्ञ के तीन तात्पर्य है :-

  • त्याग
  • बलिदान, और
  • शुभ कर्म

सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारी त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तिओं से है। इस तरह से यज्ञ(Yagya) पूजन के साथ सामाजिक उद्देश्य को पूरा करने की एक प्रक्रिया है।

वर्तमान काल में उस सर्वशक्तिमान परमात्मा (Almighty God) के साथ साझेदारी के सूत्र है :-

  • उपासना :-अपनी चेतना को सांसारिक विषयों से हटा कर परमात्मा की चेतना के निकट ले जाना और उससे भावनात्मक आदान-प्रदान के बाद उससे एक होने का प्रयास करना।
  • साधना :- अपने जीवन को ईश्वरी अनुशासन के अनुरूप ढालना।
  • आराधना :- इस सुंदर प्रकृति को और अधिक सुंदर बनाने का प्रयास करना सच्ची ईश्वरीय आराधना है। इस प्रकृति में सभी आ जाते हैं पशु, पक्षी और वृक्ष।

इस तरह से उपासना, साधना और आराधना के केंद्र में प्रकृति की है।

यज्ञ का इतिहास क्या है? – What is the History of Yagya?

प्रारंभ में यज्ञ(Yagya) का एक प्रमुख उद्देश्य समान विचार के अनेक लोगों का एकत्रीकरण रहा है।

जब अग्नि का प्रयोग शुरू हुआ होगा तो आग के चारों तरफ मानव गर्माहट के लिए बैठने लगा होगा। अन्न और भोजन को भुनने के लिए भी वह अग्नि के चारों तरफ इकट्ठा होता होगा। यह उनके सामाजिक मेलजोल का एक कारण बन गया होगा। जानवरों से सुरक्षा और ठंड से बचाव भी उनके इकट्ठा होने का कारण होता होगा।

अग्नि से लेकर यज्ञ के वैदिक(Vedic) स्वरूप तक पहुंचने में इसने एक लंबा सफर तय किया होगा। उसमें अध्यात्म और प्रकृति का शुद्धिकरण जैसे अनुभव धीरे धीरे मिले होंगे।

एक जगह इकट्ठे होने के कारण अग्नि “देव” बने रहे। आज भी होली और लोहड़ी जैसे त्योहारों मैं अग्नि की भागीदारी को समझा जा सकता है।

आज के युग में मनुष्य ने अपने आप को अकेला कर लिया है। जीवन में अकेलापन एक सामाजिक रोग बन गया है जो भी कई बीमारियों का कारण है।

आज के युग में मनुष्य ने अपने आप को अकेला कर लिया है। जीवन में अकेलापन एक सामाजिक रोग बन गया है जो भी कई बीमारियों का कारण है। वर्तमान में समाज और विश्व में चारों और जो समस्याएं हैं वह हमारी ही देन है। हमने अपने विनाश का सामान स्वयं निर्मित किया है। हमने स्वयं गलत मार्ग चुना है।

मनुष्य अब स्वयं पैदा किए संकटों के सामने लाचार अनुभव कर रहा है। वह अपने ही बनाएं चक्रव्यूह में फंस चुका है, इससे निकलने के लिए मानवीय शक्ति के आगे की शक्तियों की आवश्यकता है।

ऐसे में सनातन संस्कृति का यज्ञ संस्कार लोगों को एक साथ लाने एवं एक जगह एकत्र करने का कारण बन सकता है। यज्ञ(Yagya) में ध्यान व प्रार्थना के द्वारा देवी शक्तियों का आव्हान करते हैं, जिसका प्रयोग हमारे पूर्वज वैदिक काल (Vedic Time) से करते आ रहे हैं।

यज्ञ कितने प्रकार के होते हैं? – How Many Types of Yagya?

ये हैं प्रमुख यज्ञ :-

  • ब्रह्म यज्ञ(Brahma Yagya) :- यह सबसे पहला यज्ञ माना जाता है। ईश्वर को ही ब्रह्म कहा जाता है और ब्रह्म यज्ञ उन्हीं को अर्पित होता है। कहा जाता है की यह यज्ञ और नित्य संध्या-वंदन और स्वाध्याय के साथ वेद-पाठ करने से ऋषियों का ऋण चुक जाता है।
  • देव यज्ञ(Dev yagya) :- घर में होने वाले तमाम यज्ञ को देव यज्ञ(Dev Yagya) की ही श्रेणी में रखा जाता है। संधिकाल में गायत्री मंत्र(Gayatri Mantra) के साथ इस यज्ञ को किया जाता है और इससे देव ऋण चुकाया जाता है।

इस यज्ञ को संपन्न करने में सात पेड़ों की लकड़ियां लगती हैं, जिसमें आम(Mango), बड़, पीपल(Peepal), ढाक, जांटी, जामुन और शमी प्रयोग की जाती हैं।

इस यज्ञ-हवन(Yagya-Havan) से पॉजिटिविटी(positivity) बढ़ती है, तथा रोग-शोक(Disease) नष्ट होते हैं।

  • अश्वमेघ यज्ञ(Ashwamedha Yagya) – इस यज्ञ का आयोजन चक्रवर्ती सम्राट बनने के उद्देश्य से किया जाता था। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो सौ बार यह यज्ञ करता है, वह इंद्र का पद प्राप्त करता है।
  • राजसूर्य यज्ञ(Rajsuya Yagya) – किसी राजा द्वारा यह यज्ञ अपनी कीर्ति और राज्य की सीमाएं बढ़ाने के लिए किया जाता था। इसके अंतर्गत पड़ोसी राज्य से मित्रतापूर्वक व्यवहार द्वारा या फिर युद्ध कर के जबर्दस्ती टैक्स वसूला जाता था।
  • पितृ यज्ञ(Pitr-Yagya) :- श्रद्धा और सत् भाव के साथ किए गए कर्म, जिनसे माता-पिता और आचार्य तृप्त होते हैं, उसे ही “पितृ यज्ञ“(Pitr-Yagya) कहा जाता है। वेदों के अनुसार, श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों(Ancestors) को अर्पित किया जाता है। संतान की उत्पत्ति और उनका लाभ(origins and benefits of children) धारण करने से पितृ ऋण(Pitri loan) चुकता होता है, और इसे ही “पितृ यज्ञ“(Pitr-yagya) कहते है।
  • ‘भूत’ यज्ञ(Bhuta-Yagya) :-

हमारा शरीर पांच तत्वों से बना होता है, यह हैं :-

  1. पृथ्वी :- मृत शरीर को जलाने के लिए भूमि या जमीन पर ही चिता का निर्माण किया जाता है।
  2. जल :- दाह संस्कार के समय मटके में पानी लेकर चिता की परिक्रमा करते हैं।
  3. अग्नि :- आग का आशय जलाने से है।
  4. वायु :- वायु की मदद से ही मृत शरीर के अंतिम अवशेष आकाश की ओर जाते हैं। और
  5. आकाश :- जलने के पश्चात जो भी राख बचती है वह धुएँ एवं राख के माध्यम से आकाश में उड़ जाती है।

इन्हीं पांच तत्वों से बने शरीर के लिए यह यज्ञ किया जाता है।
भोजन करते समय कुछ अंश अग्नि में डाला जाता है और तत्पश्चात कुछ गाय, कुत्ते और कौवे को दिया जाता है, वेदों(Vedas) पुराणों(Puranas) में इसे ही ‘भूत यज्ञ‘(Bhuta-yagya) कहा गया है।

  • अतिथि यज्ञ(Atithi Yagya) या मनुश्य यज्ञ(Manushya Yagya) :- हमारे देश में ‘अतिथि देवो भव‘ की परंपरा बेहद प्राचीन रही है। घर आए मेहमानों की सेवा करना, उन्हें अन्न-जल से उचित सेवा-सत्कार करने से जहां ‘अतिथि यज्ञ‘ संपन्न होता हैं, वहीं जीव ऋण भी उतर जाता है। किसी जरूरतमंद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना भी ‘अतिथि यज्ञ‘ की श्रेणी में आता है। यह हमारा सामाजिक कर्त्तव्य भी है।

यज्ञ करने की विधि – How to Do Yagya?

परमात्मा की दैवीय शक्तियां विश्व की व्यवस्था को बनाये रखने में लगी रहती है और इसका माध्यम बनती है प्रकृति(Nature)। हम भी वैदिक काल(Vedic Time) से लोकमंगल के लिए यज्ञ(Yagya) करते हैं। इसमें देवताओं का आवाहन करते हैं और प्रकृति की शक्तियों की स्तुति गाते हैं।

Yagya

यज्ञ(Yagya) पूजन को निम्न प्रकार से करते हैं :-

  • कलश स्थापना :- सर्वप्रथम कलश स्थापित करते हैं। यहां कलश ब्रह्मांड का प्रतीक है, क्योंकि इसमें धारण करने की क्षमता है। कलश में जल होता है। यहां पर संपूर्ण ब्रह्मांड(Universe) को केंद्र में रखकर ही पूजन कर रहे हैं अथार्त प्रकृति(Nature) का ही पूजन करते हैं। हम कामना करते हैं कि कलश में स्थापित देवताओं का कार्य प्रभाव क्षेत्र बढे और निवेदन करते हैं कि उनकी हम पर विशेष कृपा दृष्टि बनी रहे।
  • शंखनाद :- यज्ञ(Yagya) का आवश्यक अंग है शंखनाद। पूजन से पहले यह ध्वनि उत्पन्न की जाती है।
  • तिलक :- यज्ञ(Yagya) में भी किसी पूजा स्तुति या कर्मकांड की तरह माथे पर चंदन धारण करते हैं या तिलक लगाते हैं। तिलक लगाते समय हम प्रार्थना करते हैं कि देव शक्तियां इस चंदन रोली के माध्यम से हमारे मस्तिष्क को सुसंस्कारित बनाएं, विचारों में श्रेष्ठता का भाव बना रहे, मस्तिष्क स्वच्छ और स्वस्थ रहें। इसमें देवत्व का संचार होता रहे।
  • अग्नि :- ऋग्वेद(Rigveda) में अग्नि को आराध्य और आदि देव माना गया है। अग्नि की गति ऊपर की ओर होती है। अग्नि स्वयं प्रकाशित हैं। अग्नि से मिलकर हर पदार्थ अग्नि रूप हो जाता है। अग्नि देव को जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब में समान रूप से में वितरित कर देते हैं। अपने लिए बचा कर रखने की प्रवृत्ति अग्नि में नहीं होती। किसी पूजन में ऐसे विचारों का होना कितना अच्छा हो सकता है। इस तरह से अग्नि देव के पूजन द्वारा सामूहिक रूप से यज्ञ करने वालो में ऐसी सोच या चेतना का विकास करने का प्रयास करते हैं।
  • आसन :- यज्ञ(Yagya) के दौरान विशेष अवस्था में बैठने का कारण उसका आसन है, जिसके द्वारा योगासन के लाभ की प्राप्ति होती है।
  • आहुति :- आहुति देने के लिए विशेष उंगलियों के प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने से का एकमात्र कारण है की एक्यूप्रेशर(Accupressure) का लाभ प्राप्त हो सके।
  • ध्वनि :- सनातन में ध्वनियों का विशेष महत्व है। धर्मशास्त्र “ ” को पृथ्वी की पहली ध्वनि मानता है। इसका निरंतर प्रयोग करने से शरीर, मन, आत्मा और आसपास के वातावरण में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • मंत्र(Mantra) :- हवन(Havan) या यज्ञ(Yagya) में मंत्रों का विशेष स्थान है। मंत्र वे शब्द है जिसके द्वारा विश्व से संपर्क स्थापित किया जाता है। यह सेतु का कार्य करते हैं, जिसके बाद फिर मंगल कामना कर सकते हैं।

यज्ञ और हवन में क्या अंतर है? – What is the Difference Between Yagya and Havan

Yagya

यज्ञ कुंड(Yagya Kund) में अग्नि के माध्यम से देवता को प्रसाद या पदार्थ पहुंचाने की प्रक्रिया है- यज्ञ(Yagya)। जिसकी अग्नि में आहुति दी जाती है उन पदार्थों को हवि, हव्य या हविष्य कहते हैं इससे हवन(Havan) का नाम पड़ा।

हवन कुंड(Havan Kund) में अग्नि प्रज्वलित करके जिन पदार्थों की आहुति दी जाती है उनमें फल, शहद, घी, लकड़ी प्रमुख है। इस कर्मकांड को ही हवन(Havan) कहते हैं।

यज्ञ और हवन(Aagya and Havan) को आज भी उतना ही शुभ और फलदायी माना जाता है जितना कि पहले था। हवन और यज्ञ(Aagya and Havan) के बीच के अंतर को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है :-

हवन(Havan) यज्ञ(Yagya)
हवन, यज्ञ का ही छोटा रूप है। पूजा के बाद अग्नि में दी जाने वाली आहुति को हवन कहा जाता है।किसी खास उद्देश्य से देवता विशेष को दी गई आहुति यज्ञ कहलाती है।
कुंड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट भोजन पहुंचाने की प्रक्रिया को हवन कहते हैं।यज्ञ में देवता, आहुति, वेद मंत्र और दक्षिणा कार्य का होना अनिवार्य है
हवन को हिंदू धर्म में शुद्धिकरण का एक कर्मकांड माना गया है।यज्ञ किसी खास उद्देश्य जैसे कि :- मनोकामना की पूर्ति और अनिष्ट को टालने के लिए की जाती है।
हवन के जरिए आसपास की बुरी आत्माओं के प्रभाव को खत्म किया जाता है।यज्ञ काफी बड़े पैमाने पर कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए की जाती है।

यज्ञ का क्या महत्व है? – What is the Importance of Yagya?

हवन(Havan) में विशेष प्रकार के पदार्थों की आहुति देने से कई प्रकार के रोग नष्ट होते हैं इसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में यज्ञ चिकित्सा(Yagya Therapy) कहते हैं। कई देशों में यज्ञ चिकित्सा(Yagya Therapy) का प्रचलन बढ़ रहा है जैसे कि टाइफाइड में नींम, चिरायता, त्रिफला और गाय का शुद्ध घी, चावल की आहुति डालने से महत्वपूर्ण गैस जैसे – एथिलीन ऑक्साइड(Ethylene Oxide), प्रोपिलीन ऑक्साइड(Propilin Oxide) आदि उत्पन्न होती है।

एथिलीन ऑक्साइड(Ethylene Oxide) गैस सबसे अधिक यूज में होने वाली बैक्टीरिया(Bacterial) रोधक गैस है। इसका उपयोग ऑपरेशन(Operation) से लेकर लाइफ सेविंग(Life-Saving) मेडिसिन(Medicine) बनाने में होता है।

प्रोपिलीन ऑक्साइड(Propilin Oxide) गैस आर्टिफिशियल वर्षा में मददगार होती है।

गाय के घी में रेडियो एक्टिव रेडिएशंस के साइड इफेक्ट्स को नष्ट करने की क्षमता होती है।

अग्नि में गाय के घी की आहुति देने से उसका धुँवा जहां तक फैलता है वहां तक का सारा वातावरण प्रदूषण और ऑटोमिक रेडिएशन से मुक्त हो जाता है।
एक चम्मच गाय के घी को अग्नि में डालने से एक टन ऑक्सीजन बनती है जो अन्य किसी उपाय से संभव नहीं है। गाय के घी में कई गुणकारी और चमत्कारी परिणाम मिलते है।

यज्ञ(Yagya) में प्रयुक्त समाग्री का नकारात्मकता को दूर करने में बहुत महत्व है। इससे पैदा होने वाली राख और गर्मी मानव शरीर और दिमाग को ठीक करती है। जब आप अग्नि के सामने बैठते हैं, तो शरीर के विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं और इस प्रकार, आपको स्वस्थ बनाते हैं।

सारांश

यज्ञ और हवन(Yagya and Havan) भारत की दुनिया को एक अद्भुत दिव्य भेंट है।

प्रकृति जिस कार्य को प्रारंभ करती है उसे पूर्ण तक पहुंचाती है। किसी भी कार्य को इनकंप्लीट छोड़ देना प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है। अतः यज्ञ(Yagya) जैसे अध्यात्म प्रयोगों व संकल्पों को पूर्णता तक पहुंचाना जरूरी है इसे ही पूर्णाहुति कहते हैं।

सनातन(Sanatan) जीवन दर्शन(Philosophy) में जीवन को यज्ञमय बनाना ही यज्ञ(Yagya) की पूर्णता है। इससे परिवार, समाज और विश्व का कल्याण होगा।

उम्मीद करता हूँ, की आप को यह आर्टिकल यज्ञ क्या होता है?(What is Yagya or Yajna) पसन्द आया होगा।

People also ask

यज्ञ की रचना किसने की?

धर्म ग्रंथों के अनुसार, यज्ञ की रचना सर्वप्रथम परमपिता ब्रह्मा ने की।

यज्ञ क्यों किए जाते हैं ?

यज्ञ से भगवान प्रसन्न होते हैं और मनोकामना पूरी करते है।

यज्ञ से क्या लाभ है ?

धन प्राप्ति, कर्मों के प्रायश्चित, अनिष्ट को रोकने के लिए, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए, रोगों के निवारण के लिए यज्ञ करने का विधान है।

हवन और यज्ञ में क्या फर्क है?

हवन यज्ञ का छोटा रूप है।

हवन किसे कहते है?

कुंड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट हवि पहुंचाने की प्रक्रिया को हवन कहते हैं।

हविष्य किसे कहते है?

जिसकी अग्नि में आहुति दी जाती है उन पदार्थों को हवि, हव्य या हविष्य कहते हैं। जिन पदार्थों की आहुति दी जाती है उनमें फल, शहद, घी,लकड़ी प्रमुख है।

अश्वमेघ यज्ञ किसे कहते है?

अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन चक्रवर्ती सम्राट बनने के उद्देश्य से किया जाता था।

ब्रह्म यज्ञ क्यों किया जाता है?

ईश्वर को ही ब्रह्म कहा जाता है और ब्रह्म यज्ञ उन्हीं को अर्पित होता है।

देव यज्ञ क्यों किया जाता है?

घर में होने वाले तमाम यज्ञ को देव यज्ञ(Dev Yagya) की ही श्रेणी में रखा जाता है। इसे ‘देवयज्ञ‘ भी कहते हैं क्योंकि यह वायु आदि पदार्थों को दिव्य कर देता है।

यज्ञ मतलब क्या है ?

यज्ञ का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को सत् प्रयोजन के लिए संगठित करना है।

हमारे पूर्वज यज्ञ क्यों करते थे?

यज्ञ से मानव के भौतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक एवं व्यक्तिगत उद्देश्य पूर्ण होते हैं।

हवन सामग्री में क्या क्या होता है?

इस यज्ञ को संपन्न करने में 7 पेड़ों की लकड़ियां लगती हैं, जिसमें आम(Mango), बड़, पीपल(Peepal), ढाक, जांटी, जामुन और शमी प्रयोग की जाती हैं

पंच महायज्ञ कौन कौन से हैं?

पंच महायज्ञ इस प्रकार हैं :-
1. ब्रह्म यज्ञ-Brahma Yagya
2. देव यज्ञ-Dev yagya
3. पितृ यज्ञ-Pitr-yagya
4. ‘भूत’ यज्ञ(Bhuta-yagya)
5. अतिथि यज्ञ-atithi yagya

यज्ञ कैसे करें?

हवन करने से पूर्व स्वच्छता का ख्याल रखें।

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